श्री राष्ट्रीय हिन्दू परिषद् — संस्कृति, सेवा और संगठन

संगठन का संविधान

नीचे दिया गया पाठ संगठन द्वारा उपलब्ध कराई गई सामग्री के अनुसार है।

परिचय और उद्देश्य

1.राष्ट्रीय हिन्दू परिषद् का उदय अप्रैल 2010 में रामनवमी की पुण्य पावन तिथि पर राजस्थान में एक सामान्य हिन्दू सम्मेलन के रूप में हुआ। यह संस्था राष्ट्रीय स्तर की गैर सरकारी, अराजनैतिक तथा एक विशुद्ध सांस्कृतिक संगठन के रूप में राष्ट्रीय भावना, हिन्दू हित, संगठित आवाज, हिन्दुत्व, हिन्दू ग्रन्थों में आस्था, आपसी सौहार्द, समता मूलक समाज की स्थापना एवं परस्पर सहयोग की भावना पैदा करेगी।

2. राष्ट्रीय हिन्दू परिषद् की मुख्यधारा:-

(क)हिन्दू धर्म, समाज एवं हिन्दुस्तान की सांस्कृतिक विरासत को आवश्यकतानुसार पुनः स्थापित, सुरक्षित, संवर्धित और सुगठित करने के लिये हिन्दुओं को संगठित एवं प्रेरित करना।

(ख) विराट् हिन्दू समाज की एकात्मता तथा पारस्परिक सद्भावना के लिये छुआछूत और ऊंच-नीच की भेदभाव पूर्ण कुरीतियों का उन्मूलन कर सामाजिक समरसता विकसित करना।

(ग) अपने परम्परागत विराट् हिन्दू समाज को भय, प्रलोभन, नासमझी या अपने ही लोगों के दुर्व्यवहार आदि किसी भी कारण से जो लोग स्वंय छोड़ गये थे या छोड़ने के लिये विवश कर दिये गये थे, इन सभी बिछुड़े हुए बन्धुओं को यदि वे अपने पुरखों के धर्म और समाज में वापस आना चाहते हैं तो उसके लिये सम्मानजनक एवम् वैद्यानिक ढंग से प्रत्यावर्तन का मार्ग प्रशस्त करना। (घ) किसी भी उम्र या लिंग के गोवंश की हत्या पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगे, गो-पालन एवं गो-संवर्धन बढ़े इसके लिये विधायी प्रयत्न एवं जागरण करना।

(ड़) दलगत राजनीति से ऊपर उठकर सभी हिन्दुओं में हिन्दुत्वनिष्ठ देशकालोचित, राष्ट्रभावना को जागृत करना। (च) गांव, नगर, वनांचल या दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों में अपने जो बन्धु सम्पर्क के अभाव में अलग-थलग पड़ गये हैं। उन बन्धुओं को राष्ट्रीय जीवन की मुख्यधारा में सम्मिलित करने के लिये विधि सम्मत सभी उपाय करना।

(छ) हिन्दू समाज के सभी धर्म सम्प्रदायों में आपसी समझ, सहयोग एवं सौहार्द को विकसित कारना।

(ज) उत्पीड़न एवं शोषण की शिकार अथवा स्वास्थ्य, गरीबी या अन्य किसी कारण से असहाय एवं पीड़ित माताओं, बहनों, बड़े-बूढ़ों को आवश्यकतानुसार सेवा एवं सहायता देना।

(ञ) राष्ट्रव्यापी भ्रष्ट्राचार का उन्मूलन एवं उसे नियंत्रित करने के लिये योजनाबद्ध ढंग से संगठित प्रयास करना।

(ट) भारतवर्ष/हिन्दुस्तान को यथाशीघ्र एक विकसित समुन्नत और समृद्ध राष्ट्र के रूप में प्रतिष्ठित करने में सहयोगी बनना।

(ठ) शिक्षित बेरोजगार युवाओं को स्वावलम्बी बनाने तथा रोजगार से जोड़ने के लिये सरकारी-गैरसरकारी स्तर पर यथासम्भव अवसर एवं सहायता उपलब्ध कराना।

(ड) समान विचारधारा के सभी संगठनों में आपसी समन्वय स्थापित करना तथा समान विचारधारा वाले राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों से सम्बद्धता प्राप्त कराना।

(ढ़) उपर्युक्त उद्देश्यों की पूर्ति के लिये आवश्यकतानुसार कोई भी छोटा-बड़ा अनुषांगिक संगठन, संस्थान या प्रकल्प स्थापित करना। साहित्य, मुद्रण और प्रकाशन प्रारम्भ करना तथा ‘‘हिन्दू कोष’’ की स्थापना करना।

मुख्य संरक्षक और प्रमुख

02. श्री राष्ट्रीय हिन्दू परिषद की सदस्यता के लिए अधोलिखित विवरण के अनुसार चार कोटियाँ होंगी।

मुख्य सरक्षक :- संस्था में मुख्य संरक्षक व् प्रमुख एक - एक ही पद होगा और मुख्य सरंक्षक व् प्रमुख पद पर उनके द्वारा नामित व्यक्ति ही आसीन होगा , मुख्य सरक्षक दाईत्व राष्ट्रीय हिन्दू परिषद् का प्रथम व् प्रमुख दुसरा पद या आप उसे परिषद् का प्रथम व् दुसरे नागरिक भी कह सकते हे मुख्य सरक्षक व् प्रमुख का आदेश परिषद् के सभी अधिकारियो को मानना होगा इस दाईत्व की अवधि आजीवन रहेगी और अगर इस पद पर रहते हुए किसी की हरी इच्छा हो जाती हे तो राष्ट्रीय स्तरीय अधिकारी मिलकर नये मुख्य सरक्षक व् प्रमुख की नियक्ति करेंगे लेकिन उसमे भी मुख्य सरक्षक कोई संत या भगवा धारी ही होगा और प्रमुख कोई भी और एक बार किसी मुख्य सरक्षक व् प्रमुख की नियक्ति हो जाती हे तो फिर वो आ जीवन हो जाती हे या नियक्त मुख्य सरक्षक व् प्रमुख अपनी मर्जी से हटना चाहे तो वो हट सकते हे फिर नई नियक्ति की जा सकती हे

मुख्य संरक्षक व प्रमुख के अधिकार एवं कर्तव्य:-

मुख्य संरक्षक व प्रमुख संस्था के सर्वोच्च अभिभावक होंगे। सामान्य परिस्थितियो में यद्यपि उन्हें साधारण सभा या कार्यकारिणी समिति की किसी कार्रवाई अथवा बैठक में भाग लेना आवश्यक नहीं होगा तथापि आवश्यक समझने पर वह सभा या कार्यकारिणी समिति की बैठक आहूत कर सकते हैं तथा उसे कोई निर्देश/सलाह दे सकते हैं, जिस पर सभी सम्बन्धित को विचार करना आवश्यक होगा। विशेष परिस्थितियों में जब संस्था में या उसकी किसी ईकाई में विवाद के कारण संकट पूर्ण स्थिति उत्पन्न हो जाए तब वह किसी भी स्तर पर हस्तक्षेप कर सकते हैं। उनका निर्देश/निर्णय सर्वसम्बन्धित के लिये बाध्यकारी होगा। वह संगठन के हित में प्रभारी/पदाधिकारी भी नियुक्त कर सकते हैं।

सदस्यता नियम

03. श्री राष्ट्रीय हिन्दू परिषद सदस्यता

(ख) आजीवन सदस्य:- संस्था के संस्थापक सदस्य जिनके नाम संस्था के स्मृति पत्र (मेमोरण्डम) पर अंकित है वे संस्था के आजीवन सदस्य होगें। इनके अतिरिक्त जिन्हें एतदर्थ निर्धारित रू 1100 /- शुल्क लेकर सदस्यता प्रदान की जायेगी, वे भी संस्था के आजीवन सदस्य होंगे। आजीवन सदस्य साधारण सभा के सदस्य होंगे तथा नामित अथवा निर्धारित होने पर ये कार्यकारिणी समिति के सदस्य या पदाधिकारी भी हो सकते हैं।

(ग) सक्रिय सदस्य:- एतदर्थ निर्धारित रू 100 /- शुल्क जमा कर कोई भी व्यक्ति जिसे अध्यक्ष ने स्वीकार किया हो संस्था का सक्रिय सदस्य बन सकता है। सक्रिय सदस्य भी साधारण सभा का सदस्य होगा और नामित अथवा निर्वाचित होने पर संस्था की कार्यकारिणी का सदस्य अथवा पदाधिकारी हो सकता है।

(घ) विशेष आमंत्रित सदस्य:- संस्था अपने मार्गदर्शन हेतु हिन्दुत्व के उत्कर्ष के लिये उल्लेखनीय कार्य करने वाले किसी विशिष्ट व्यक्ति से बिना कोई शुल्क लिये अपनी साधारण सभा या कार्यकारिणी में विशेष आमंत्रित या मानद रूप में सदस्य बना सकती है। ऐसे सदस्यों को साधारण सभा या कार्यकारिणी समिति में भाग लेने और अपना परामर्श देने का अधिकार होगा परन्तु किसी ऐसे विषय पर जिसमें मतदान की स्थिति उत्पन्न होगी, मतदान करने का अधिकार नहीं होगा।

नियुक्ति अधिकार

04. श्री राष्ट्रीय हिन्दू परिषद नियुक्ति अधिकार

श्री राष्ट्रीय हिन्दू परिषद द्वारा सम्पूर्ण हिंदुस्तान के किसी भी राज्य , सम्भाग , जिले , तहसील , नगर में कोई अधिकारी बनाया जाता है तो उसकी नियुक्ति की जाती है लेकिन नियुक्ति अगर संविधान के अंतर्गत की जाएगी तो ही मान्य होगी अन्यथा मान्य नही होगी चाहे वो राष्ट्रीय स्तरीय नियुक्ति हो या नगर स्तरीय नियुक्ति हो किसी भी अधिकारी की नियुक्ति के लिए सभी कमेटीयो में दो अधिकारियो को कमेटी अध्यक्ष और कमेटी महामंत्री को अधिकार दिया गया है हा अगर कहि नई कमेटी बनती है और वहां अध्यक्ष और महामंत्री नही है तो उस कमेटी के सयोजक व उपाध्यक्ष का अधिकार रहेगा वो उनके लेवल किसी भी कमेटी मेम्बर की नियुक्ति कर सकते है

० मुख्य सरंक्षक के पास किसी भी कमेटी में नियुक्ति व किसी भी अधिकारी को हटाने का अधिकार है

० राष्ट्रीय प्रमुख के पास भी किसी भी कमेटी में नियुक्ति व किसी भी स्तर के अधिकारी को हटाने का अधिकार है

० राष्ट्रीय अध्यक्ष व राष्ट्रीय महामंत्री के पास सम्पूर्ण राष्ट्रीय कार्यकरणी व प्रदेश में अध्यक्ष, महामंत्री ओर जरूरत होने पर सम्पूर्ण प्रदेश कमेटी की नियुक्ति व कमेटी को हटाने का अधिकार है लेकिन मुख्य सरंक्षक व राष्ट्रीय प्रमुख को हटाने का कारण लिखित में देकर हटायेगे

० प्रदेश अध्यक्ष व प्रदेश महामंत्री के पास सम्पूर्ण प्रदेश कमेटी की नियुक्ति करने व हटाने का अधिकार है लेकिन इसकी सूचना पहले राष्ट्रीय अध्यक्ष को देनी होगी लिखित में ओर अगर अपने निजी फायदे के लिए प्रदेश अध्यक्ष व महामंत्री किसी को हटाते है और उसकी शिकायत मिलती है तो प्रदेश अध्यक्ष व महामंत्री की आजीवन सदस्यता समाप्त हो जाएगी ओर प्रदेश में अध्यक्ष व महामंत्री नही है तो नियुक्ति का अधिकार प्रदेश सयोजक व उपाध्यक्ष का रहता है और उन पर भी उपरोक्त प्रदेश अध्यक्ष व महामंत्री जैसे ही नियम लागू होंगे

कार्यकाल और अनुशासन

05. श्री राष्ट्रीय हिन्दू परिषद् समय सीमा

श्री राष्ट्रीय हिन्दू परिषद् के सभी राष्ट्रीय,प्रदेश,सम्भाग ,जिला,तहसील,नगर तक सभी अधिकारियों के कार्य करने की समय सीमा रहेगी वो भी श्री राष्ट्रीय हिन्दू परिषद् के संविधान के अंतर्गत होगी सभी अधिकारियों की समय सीमा तीन साल तक निर्धारित रहेगी और अगर किसी अधिकारी का कार्य , व्यवहार सदस्यों में उनका आदर विचार अच्छे बने हुए है ओर वास्तविक उनका कार्य परिषद के प्रति अच्छा है तो पूरी कार्यकारणी ( कमेटी ) के प्रस्ताव व अनुमति पत्र से उस अधिकारी की समय अवधि संविधान के अंतर्गत 3 साल की और बढ़ाई जा सकती है ओर सविधान के अंतर्गत अगर किसी अधिकारी की नियुक्ति होने के दौरान अगर वो अधिकारी लगातार तीन महीने तक कोई कार्य नही देता है यानी 90 दिन के अंदर श्री राष्ट्रीय हिन्दू परिषद की एक भी बैठक में भाग नही लेता या एक भी बैठक नही करवाता या कोई कार्यक्रम या एक भी सदस्य नियुक्त नही करता तो 90 दिन पूरे होते ही उस अधिकारी पर उसके उच्च अधिकारी द्वारा उस पर कार्यवाही करना अनिवार्य है यहां तक कि उस अधिकारी की आजीवन सदस्यता समाप्त हो जाती है अगर वो प्रदेश अध्यक्ष है तो उसकी सदस्यता रद्द करने का अधिकार मुख्य सरंक्षक , राष्ट्रीय प्रमुख/अध्यक्ष को होगा ! अगर कोई अधिकारी किसी कारणवश कार्य नही कर पा रहा है तो उस अधिकारी को लिखित में कार्य नही करपाने का कारण उसके उच्च अधिकारी को तीन महीने होने से पहले पहले लिखित रिपोर्ट देनी होगी ( नियम व शर्ते लागू *)

राष्ट्रीय अध्यक्ष

06. श्री राष्ट्रीय हिन्दू परिषद् ( राष्ट्रीय अध्यक्ष )

राष्ट्रीय हिन्दू परिषद् के राष्ट्रीय अध्यक्ष का दाईत्व परिषद् में बहुत महत्त्वपूर्ण पद होता हे इसलिए राष्ट्रीय अध्यक्ष् को परिषद् कमेटी का प्रथम नागरिक कहा जाता हे जिसका पांच साल का कार्यकाल होता हे और अगर राष्ट्रीय अध्यक्ष ने परिषद् में गोरवपूर्ण काम किया हो तो बिना चुनाव ही उनका कार्यकाल पांच साल बढ़ाया जा सकता हे वो भी सभी राष्ट्रीय अधिकारियो की अनुमति से और बैठक में प्रस्ताव मंजूर करके और अगर राष्ट्रीय अध्यक्ष का व्यवहार अच्चा नही हे और कार्य सही नही कर पा रहे हे तो राष्ट्रीय कार्यकारणी के 80% अधिकारी एक पत्र लिखकर परिषद् के मुख्य सरक्षक को दे सकते हे फिर मुख्य सरक्षक 11 दिन का समय राष्ट्रीय अध्यक्ष को देंगे ताकि वो सभी अधिकारियो को मिलकर एक विस्वास प्रस्ताव ला सके आगर वो विस्वास प्रस्ताव नही ला पाते तो मुख्य सरक्षक उन्हें अपने पद से मुक्त कर देंगे और फिर नये राष्ट्रीय अध्यक्ष की नियक्ति की जाएगी नये राष्ट्रीय अध्यक्ष की नियक्ति चुनाव से की जाएगी

राष्ट्रीय अध्यक्ष की नियक्ति के बाद राष्ट्रीय अध्यक्ष सर्वप्रथम राष्ट्रीय महामंत्री व् राष्ट्रीय सचिव की नियक्ति करेंगे उसके बाद तीनो अधिकारी मिलकर पूरी राष्ट्रीय कार्यकारणी नियक्त करेंगे नियक्ति पत्र में तीनो अधिकारियो की सील व् हस्ताक्षर होने अनिवारिय हे और अगर किसी आपातकालीन स्थिथि में राष्ट्रीय अध्यक्ष स्वय ही अकेले ही किसी राष्ट्रीय व् प्रदेश स्तरीय नियक्ति कर सकते हे और आपात स्थिथि में किसी भी अधिकारी को हटा भी सकते हे जिस पर कोई भी राष्ट्रीय व् प्रदेश स्तरीय अधिकारी आप्ति नही करेगा कियोकी राष्ट्रीय अध्यक्ष राष्ट्रीय कमेटी का प्रथम नागरिक होने के नाते यह अधिकार हे और अगर राष्ट्रीय अध्यक्ष ने अपने फायदे या गलत तरीके से किसी को हटाया तो सभी अधिकारी उसके खिलाफ मुख्य सरक्षक के पास अविश्वास प्रस्ताव लेके जा सकते हे जिस पर राष्ट्रीय अधिकारी को अपना दाईत्व खोना पड़ सकता हे

09358670182